शिक्षा पर निबंध | Essay on Education in Hindi

शिक्षा पर निबंध | Essay on Education in Hindi: आज के दौर में शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता और जन्मसिद्ध अधिकार हैं. हमारी अनौपचारिक शिक्षा की शुरुआत अपने घर से ही हो जाती हैं. माँ को पहले शिक्षक की संज्ञा दी जाती हैं. शिक्षा की तुलना ब्रह्मास्त्र से की जाती हैं, जिसके बलबूते पर सब कुछ अर्जित किया जा सकता हैं. अच्छी शिक्षा ही उचित अनुचित का भेद कराती हैं तथा सही तरीके से जीवन जीने की दिशा प्रदान करती हैं. यह कारण हैं कि आज के समय में शिक्षा को सभी मूलभूत आवश्यकताओं में सबसे पहली प्राथमिकता दी जाती हैं. आज के शिक्षा निबंध, भाषण, अनुच्छेद एस्से स्पीच में हम जानेगे कि शिक्षा का जीवन में क्या महत्व हैं तथा प्रत्येक बालक को बुनियादी शिक्षा मिलनी क्यों जरुरी हैं.

शिक्षा पर निबंध | Essay on Education in Hindi

Concept Of Education (शिक्षा की संकल्पना): शिक्षा मनुष्य के विकास की पूर्णत अभिवृति हैं, शिक्षा को शब्द संग्रह अथवा समूह के रूप में न देखकर विभिन्न शक्तियों के विकास के रूप में देखा जाना चाहिए. शिक्षा से ही व्यक्ति सही रूप में चिन्तन करना सीखता हैं. तथ्यों के संग्रह मात्र का नाम शिक्षा नहीं हैं. इसका सार मन में एकाग्रता के रूप में प्रकट होना चाहिए. शिक्षा व्यक्तियों का निर्माण करती हैं.

चरित्र को उत्कृष्ट बनाती हैं और व्यक्ति को संसारिक करती हैं. जो मनुष्य को मनुष्य बनाती हैं. वही सही अर्थ में शिक्षा हैं.शिक्षा बालक के नैतिक, सामाजिक, शारीरिक, संवेगात्मक, बौद्धिक और आंतरिक ज्ञान को बाहर लाने में योग देने वाली एक क्रिया हैं. शिक्षा सीखना नहीं हैं. वह मस्तिष्क की शक्तियों का अभ्यास और विकास हैं. शिक्षा क्या हैं इसे अलग अलग विद्वानों ने अपने अपने ढंग से परिभाषित किया हैं, कुछ विद्वानों के विचार यहाँ दिए गये हैं.

प्लेटों के अनुसार शिक्षा: "शिक्षा से मेरा अभिप्रायः उस प्रशिक्षण से हैं जो अच्छी आदतों के द्वारा बालक में नैतिकता का विकास करती हैं."

अरस्तू के अनुसार: "शिक्षा स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण करती हैं."

स्वामी विवेकानंद के अनुसार: "हमे उस शिक्षण की आवश्यकता हैं, जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता हैं, मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती हैं बुद्धि का विकास होता हैं और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हैं."

रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार: "शिक्षा का उद्देश्य आध्यात्मिक विकास करना हैं."

प्रस्तावना

शिक्षा को हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण उपकरण माना जा सकता हैं, जो प्रत्येक मानव के लिए बेहद उपयोगी हैं. शिक्षा के कारण ही मनुष्य पृथ्वी के अन्य प्राणियों से भिन्न हैं. मानव आज तरक्की पसंद हैं तो इसका कारण शिक्षा ही हैं. शिक्षा व्यक्ति को जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने योग्य बनाती हैं. शिक्षा के माध्यम से हम इच्छित स्वप्न को साकार कर अपने जीवन को मनचाही राह दे सकते हैं.

आज के दौर में अशिक्षित व्यक्ति के लिए अच्छी तरीके से जीवन निर्वहन करना भी कठिन हैं. शिक्षा न केवल व्यक्ति को सही गलत का भेद सिखाती हैं. बल्कि अच्छे तरीके से जीविकापार्जन हेतु सक्षम बनाती हैं. आज के दौर में किसी भी व्यवसाय में काम करने के लिए शिक्षित होना पहली शर्त मानी जाती हैं. बिना पढ़े लिखे कुछ भी सम्भव नहीं हैं, पढ़ लिखकर कुछ भी असम्भव को किया जा सकता हैं.

आज के बौद्धिक वर्चस्व के दौर में वही तरक्की पाता हैं, जिनके पास ज्ञान की शक्ति हैं, जिसे शिक्षा के जरिये ही प्राप्त किया जा सकता हैं. दुनिया का स्वरूप बदल चूका हैं. अब लड़ाईयां हथियारों से नहीं बल्कि दिमाग में ही लड़ी जाती हैं. इसलिए दौर में अच्छे ढंग से जीने एवं कुछ कर गुजरने के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं.

शिक्षा का अधिकार (Right to Education)

आबादी के लिहाज से हमारा भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश हैं, वही सबसे अधिक अशिक्षितों के मामले में पहला स्थान भारत का हैं, जो बेहद चिंताजनक हैं. एक दशक पूर्व भारतीय संसद द्वारा पारित निशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा एक्ट २००९ ने शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बना दिया हैं. RTE के नाम से जाने जाने वाले इस अधिनियम के तहत अब शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का मूलभूत अधिकार हैं. माता पिता एवं सम्बन्धित राज्य सरकार का यह दायित्व हैं कि प्रत्येक 6 से 14 वर्ष के बालक को प्रारम्भिक शिक्षा दिलाने का प्रबंध करें.

शिक्षा का प्राचीन अर्थ (Ancient meaning of education In Hindi)

प्राचीन शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को नैतिक जीवन से परिपूर्ण करना था और शिक्षा के द्वारा बालक में अन्तः शक्तियों का विकास तथा मानवीय ज्ञान का प्रकाश पैदा करना था. इन सभी के लिए शिक्षा शिक्षा द्वारा नैतिकता व आचरण पर बल दिया जाता था. इसी आदर्श को ह्रद्यागमन कर वैदिक ऋषि समुदाय लोक कल्याण एवं आत्मिक विकास के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते थे. इस प्रकार प्राचीन शिक्षा का मूल आधार नैतिक शिक्षा थी.

प्राचीन शिक्षा में सत्यम शिवम सुन्दरम् के अनुसार विश्व कल्याणार्थ सदैव सदाचारी चिन्तन किया जाता था. ऋषि तपस्या करते थे. छात्र तपस्वी एवं वृत बनाकर शिक्षा प्राप्त करते थे. संयम से रहना उनका प्रमुख उद्देश्य था. छात्रों में गुरु एवं बड़ों के लिए सम्मान था. किन्तु आज की शिक्षा में नैतिकता का अभाव हैं. प्राचीन काल में सम्पूर्ण समाज में गुरुओं का आदर होता था. प्राचीन शिक्षा का सम्बन्ध नैतिक मूल्यों से था. उस समय की शिक्षा में नैतिकता की शिक्षा समाहित थी. प्राचीन काल की शिक्षा के प्रमुख बिंदु निम्न हैं.

  1. आध्यात्मिकता
  2. आत्म सिद्धि
  3. धर्म एवं आचरण
  4. ज्ञान प्राप्ति एवं जिज्ञासा
  5. नैतिक मूल्यों के सम्बन्ध में स्वतंत्र विचार
  6. सहनशीलता एवं श्रद्धाभाव

शिक्षा का आधुनिक अर्थ (Modern meaning of education)

आधुनिक समय में शिक्षा को गतिशील माना गया हैं. तथा आजीवन चलने वाली बताया गया हैं. शिक्षा शब्द का प्रयोग तीन रूपों में किया जाता हैं.

  1. ज्ञान के लिए
  2. मानव के शारीरिक एवं मानसिक व्यवहार में परिवर्तन के लिए
  3. विषय के लिए

शिक्षा विषय के रूप में शिक्षाशास्त्र कहलाता हैं. शिक्षा शास्त्र में शिक्षा की प्रक्रिया के विभिन्न अंग निम्न हैं.

  • शिक्षक
  • शिक्षार्थी
  • पाठ्यक्रम

शिक्षा का शाब्दिक अर्थ (Literal meaning of education)

शिक्षा को अंग्रेजी भाषा में एजुकेशन कहते हैं. एजुकेशन शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के तीन शब्द Educatiom, educier, educare से हुई हैं. Education शब्द की रचना दो शब्दों Aduco से हुई हैं. जहाँ a का अर्थ अंदर से तथा Duco का अर्थ आगे बढने से हैं. इसी प्रकार एजुकेशन का अर्थ अंदर से विकास करना हैं. बालक की आंतरिक शक्तियों का विकास करना.

शिक्षा का संकुचित अर्थ (Narrow meaning of education)

वर्तमान समय में शिक्षा का मुख्य आधार छात्र को माना गया हैं. शिक्षा के संकुचित अर्थ से तात्पर्य यह हैं कि शिक्षा एक निश्चित स्थान, निश्चित पाठ्यक्रम के आधार पर दी जाती हैं. उसे शिक्षा का उद्देश्य बालक को केंद्र मानकर दी जाती हैं. वर्तमान समय में जिस निश्चित स्थान पर दी जाती हैं, उसे विद्यालय कहते हैं. विद्यालय में दी जाने वाली शिक्षा का निर्धारित पाठ्य क्रम होता हैं. इस शिक्षा को औपचारिक शिक्षा भी कहते हैं.

शिक्षा की परिभाषा आध्यात्मिक दृष्टि से

  • विष्णु पुराण के अनुसार– विद्या वह हैं जो मुक्ति दिलाएं
  • महात्मा गाँधी के अनुसार– शिक्षा से मेरा तात्पर्य हैं कि जो बालक एवं मनुष्य के शरीर, आत्मा एवं मन का सर्वांगीण विकास.

शिक्षा की परिभाषा वैयक्तिक विकास/ जन्मजात शक्तियों की दृष्टि से

  • हरबर्ट– शिक्षा नैतिक चरित्र का उचित विकास हैं.
  • फ्रोबेल-शिक्षा एक प्रक्रिया हैं जिसके द्वारा बालक अपनी जन्मजात शक्तियों को अभिव्यक्त करता हैं.

शिक्षा की प्रक्रिया (Education process)

  1. शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया हैं.
  2. शिक्षा द्विमुखी प्रक्रिया हैं.
  3. शिक्षा त्रिमुखी प्रक्रिया हैं.
  4. बालक की जन्मजात शक्तियों का विकास ही शिक्षा हैं.
  5. शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं हैं.

शिक्षा का महत्व (importance of education In Life)

शिक्षा के अर्थ एवं परिभाषा पर विचार करने से यह स्पष्ट हो गया हैं कि मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली शिक्षा अवश्य ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. शिक्षा का महत्व उसके कार्य ही हैं. शिक्षा व्यक्ति के प्रत्येक पहलू को विकसित करके उसके उसके चरित्र का निर्माण करती हैं. और मानवता का पाठ पढ़ाती हैं.

शिक्षा के कार्य (Educational work In Hindi)

  • व्यक्ति से सम्बन्धित कार्य– आंतरिक शक्तियों का विकास करना, व्यक्तियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का उचित विकास, भावी जीवन की तैयारी, नैतिक विकास, मानवीय गुणों का विकास
  • समाज से सम्बन्धित कार्य– सामाजिक नियमों का ज्ञान, प्राचीन साहित्य का ज्ञान, सामाजिक उन्नति में सहायक, बुराई के निवारण में सहायक
  • राष्ट्र से सम्बन्धित कार्य– भावनात्मक एकता, राष्ट्रीय विकास, राष्ट्रीय एकता
  • प्राकृतिक वातावरण से सम्बन्धित कार्य– वातावरण परिवर्तन, समायोजन

शिक्षा के प्रकार (Types of education In Hindi)

औपचारिक शिक्षा (formal education)

औपचारिक शिक्षा को हम नियमित शिक्षा कहते हैं. किसी संस्था द्वारा एक विशेष विधि व व्यवस्था के अनुसार किसी निश्चित उद्देश्य को सामने रखकर किसी विशेष समय में दी जाती हैं. विद्यालय वह स्थल हैं जिसे समाज अपनी आवश्यकतानुसार स्थापित करता हैं. प्रकार की शिक्षा आचरण में परिवर्तन लाने के लिए पूर्व संयोजित होती हैं जिसमें एक उद्देश्य की ओर ध्यान रखा जाता हैं.

औपचारिक शिक्षा की विशेषताएं (Characteristics of formal education)
  1. औपचारिक शिक्षा नियमित होती हैं.
  2. इसमें पहले योजना बना ली जाती हैं.
  3. इसमें उद्देश्य पहले से ही निर्धारित होते हैं.
  4. औपचारिक शिक्षा में उद्देश्य प्राप्ति के अनुसार ही पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता हैं.

अनौपचारिक शिक्षा (Informal education)

अनौपचारिक शिक्षा अनियमित शिक्षा के अंतर्गत आती हैं. इस शिक्षा में न तो पहले से योजना बनाई जाती हैं न ही कोई निश्चित समय होता हैं. यह शिक्षा बालक के स्वाभाविक विकास के साथ साथ चलती हैं. जन्म के पश्चात बालक को वातावरण के अनुकूल बनने के लिए प्रतिक्रियाशील हो उठता हैं. यही से उसकी अनौपचारिक शिक्षा आरम्भ होती हैं. बालक समाज में रहकर अपने बड़ों का अनुसरण करके एयर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में स्वयं अनुभव प्राप्त करके शिक्षा प्राप्त करता हैं.

अनौपचारिक शिक्षा की विशेषताएं (Characteristics of informal education)
  1. अनौपचारिक शिक्षा अनियमित होती हैं.
  2. इसमें पहले से कोई योजना नहीं बनाई जाती हैं.
  3. यह शिक्षा बालक के स्वाभाविक विकास के साथ साथ चलती हैं.
  4. बालक इससे स्वयं अनुभव प्राप्त कर शिक्षा प्राप्त करता हैं.
निरौपचारिक शिक्षा 

निरौपचारिक शिक्षा औपचारिक शिक्षा तथा अनौपचारिक शिक्षा का मिश्रित रूप हैं.

दूरस्थ शिक्षा (distance education)

दूरस्थ शिक्षा को अनेक नामों से पहचाना जाता हैं. जैसे मुक्त अधिगम, अथवा शिक्षा पत्राचार, शिक्षा बाहरी अध्ययन आदि, गृह अध्ययन, परिसर से बाहर अध्ययन आदि भारत में दूरस्थ तथा मुक्त शिक्षा के नाम से जाने जाते हैं.

निशुल्क एवं सार्वभौमिक शिक्षा (Free and universal education)

अपने गुरु को दक्षिणा अवश्य देता था. वह दक्षिणा के रूप में धन, पशु, भूमि तथा अन्य कुछ भी दे सकता था. शिक्षा निशुल्क होने के कारण सार्वभौमिक और सभी के लिए थी.

  • उपयुक्त समय में शिक्षा आरम्भ: शिक्षा का आरम्भ 5 वर्ष की आयु में हो जाता था. और सर्वजातियों के लिए होता था. इसे विद्यारम्भ संस्कार कहा गया.
  • शिक्षा में धार्मिक तथ्यों का समावेश: प्राचीनकाल में शिक्षार्थियों का जीवन धर्मयुक्त होता था. शिक्षा का आशय एक धार्मिक संस्था होने से था. अध्यापक को यह पढ़ाना पड़ता था कि प्रार्थना और यज्ञ कैसे करे तथा इस प्रकार अपने जीवन की अवस्था के अनुकूल स्वयं के कर्तव्यों को पूर्ण करें. भारतीय शिक्षा में आवश्यक रूप से धार्मिक तथ्यों का समावेश था.

गुरुकुल प्रणाली (Gurukul system)

प्राचीन काल में छात्र गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे. शिक्षा के केंद्र में गुरु के आश्रम गाँव व नगरों से दूर प्राकृतिक वातावरण में होते थे. छात्र वृक्ष की छाया में वेदों का अध्ययन करते हुए मानसिक एवं एकाग्र, शारीरिक रूप से स्वस्थ होते थे. छात्र शिक्षा हेतु गाँवों एवं नगरों से दूर जाया करते थे.

  • उपनयन संस्कार: यह संस्कार उस समय में होता था जब बालक गुरु के संरक्षण में वैदिक शिक्षा आरम्भ करता था. उपनयन का शाब्दिक अर्थ होता हैं, पास ले जाना. उपनयन के बाद छात्र ब्रह्मचारी कहलाने लगता था. यह प्रत्येक वर्ग के छात्र के लिए अनिवार्य था. परन्तु शूद्रों का उपनयन संस्कार ही होता था.
  • गुरु शिष्य संबंध: वैदिक काल में गुरु शिष्य सम्बन्ध बड़ा ही मृदुल था. गुरु शिष्य के साथ पुत्रवत व्यवहार करते थे. और शिष्य गुरु के साथ पित्रवत व्यवहार करते थे. इसका वर्णन इस प्रकार था.
  1. गुरु के प्रति शिष्य के दायित्व
  2. शिष्य के प्रति गुरु के कर्तव्य

वैदिक शिक्षा के गुण (Qualities of vedic education)

वैदिक शिक्षा को हम दूसरे शब्दों में गुरुकुल प्रणाली भी कह सकते हैं. छात्र प्राय 8 वर्ष की अवस्था में माता पिता को छोड़कर गुरुकुल में प्रवेश करता था. और उसे ब्रह्मचारी के रूप में 24 वर्ष तक रहना पड़ता था.

  1. शिक्षा व्यवस्था
  2. शिक्षा के उद्देश्य
  3. गुरु शिष्य सम्बन्ध
  4. अनुशासन
  5. पाठ्यक्रम
  6. व्यावसायिक शिक्षा

वैदिक शिक्षा के दोष (Defects of vedic education)

  1. धर्म पर अधिक बल
  2. भौतिक विज्ञानों की अपेक्षा
  3. हस्तकला की uपेक्षा
  4. शुद्रो की शिक्षा की उपेक्षा
  5. स्त्री शिक्षा की उपेक्षा

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